₹22,006 करोड़ के कर्ज के बदले सिर्फ ₹6.5 करोड़: NCLT ने सुभाष चंद्रा की repayment plan को दी मंजूरी
नई दिल्ली, 27 अगस्त 2026: Zee Group के संस्थापक Subhash Chandra को लेकर National Company Law Tribunal (NCLT) का एक बड़ा फैसला सामने आया है। NCLT ने उनकी व्यक्तिगत insolvency proceedings में करीब ₹22,006.57 करोड़ के admitted creditor claims के मुकाबले लगभग ₹6.5 करोड़ के repayment plan को मंजूरी दे दी है। इससे creditors को मूल दावे का करीब 0.03% ही वापस मिलेगा, जबकि लगभग 99.97% का haircut बनता है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला सुभाष चंद्रा द्वारा विभिन्न कंपनियों को दिए गए loans के लिए personal guarantor होने से जुड़ा है। 2022 में Indiabulls Housing Finance, जिसे अब Sammaan Capital के नाम से जाना जाता है, ने करीब ₹170 करोड़ के एक loan के repayment में default को लेकर insolvency proceedings शुरू की थीं। यह मामला 2024 में admit हुआ और इसके बाद अन्य creditors ने भी अपने claims दाखिल किए। कुल admitted claims बढ़कर लगभग ₹22,006.57 करोड़ तक पहुंच गए।
हालांकि, सुभाष चंद्रा ने यह स्पष्ट किया है कि उनके खिलाफ बताई जा रही पूरी रकम व्यक्तिगत रूप से उनके द्वारा लिया गया कर्ज नहीं है। उनके अनुसार, यह आंकड़ा उन corporate borrowings से संबंधित guarantees का कुल दावा है, जिनमें उन्होंने personal guarantee दी थी।
₹6.5 करोड़ में क्या शामिल है?
मंजूर किए गए plan में लगभग ₹6.25 करोड़ creditors को और ₹25 लाख insolvency resolution process के खर्चों के लिए निर्धारित हैं। Plan को creditors के 80.81% voting share का समर्थन मिला।
इसका सीधा अर्थ है कि ₹100 के admitted claim पर creditors को लगभग 3 पैसे की recovery होगी।
| विवरण | रकम |
|---|---|
| कुल admitted claims | ₹22,006.57 करोड़ |
| Creditors के लिए प्रस्तावित भुगतान | ₹6.25 करोड़ |
| Process costs | ₹25 लाख |
| कुल plan value | करीब ₹6.5 करोड़ |
| अनुमानित recovery | करीब 0.03% |
| अनुमानित haircut | करीब 99.97% |
NCLT में क्यों हुआ विवाद?
मामले में NCLT की शुरुआती bench के दो सदस्यों के बीच मतभेद हो गया था। इसके बाद तीसरे सदस्य Nilesh Sharma को इस मतभेद को सुलझाने के लिए नियुक्त किया गया। उन्होंने 25 अगस्त 2026 को repayment plan को मंजूरी दी।
कुछ बड़े lenders ने plan का विरोध किया। LIC Housing Finance सहित dissenting creditors ने recovery को बेहद कम बताते हुए asset valuation और voting process पर सवाल उठाए। LIC Housing Finance का दावा करीब ₹1,322 करोड़ तक बताया गया, जबकि प्रस्तावित recovery उसके मुकाबले केवल लगभग ₹38 लाख थी।
Creditors के सवाल क्या हैं?
विरोध करने वाले lenders ने मुख्य रूप से दो मुद्दे उठाए—पहला, सुभाष चंद्रा की वर्तमान assets/net worth की पर्याप्त जांच और valuation; दूसरा, creditor voting process।
रिपोर्टों के अनुसार, creditors ने उनकी reported net worth में भारी गिरावट पर सवाल उठाए। इसी वजह से कुछ lenders ने अधिक विस्तृत scrutiny और forensic examination की मांग की थी।
क्या ₹22,006 करोड़ का पूरा कर्ज माफ हो गया?
इसे सीधे तौर पर “₹22,006 करोड़ का कर्ज माफ” कहना सही नहीं होगा। NCLT ने personal insolvency resolution process के तहत एक repayment plan को मंजूरी दी है। ₹22,006.57 करोड़ का आंकड़ा admitted creditor claims को दर्शाता है, जबकि approved plan के तहत लगभग ₹6.5 करोड़ का भुगतान निर्धारित है।
सुभाष चंद्रा ने भी कहा है कि मीडिया में बताई जा रही ₹22,006 करोड़ की राशि को उनके व्यक्तिगत रूप से लिए गए कर्ज के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार, underlying borrowing entities ने जनवरी 2019 से लगभग ₹43,000 करोड़ का repayment किया है।
आगे क्या होगा?
NCLT के फैसले के बाद मामला यहीं खत्म होना जरूरी नहीं है। कुछ lenders ने फैसले को चुनौती देने की तैयारी की है। रिपोर्टों के मुताबिक HDFC Bank के साथ Axis Bank, Canara Bank, RBL Bank और Union Bank of India जैसे lenders NCLAT का रुख कर सकते हैं और voting process तथा asset scrutiny को लेकर आपत्तियां उठा सकते हैं।
क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
सुभाष चंद्रा का मामला भारत में personal insolvency, personal guarantees और creditor recovery को लेकर महत्वपूर्ण सवाल खड़े करता है। एक तरफ insolvency कानून का उद्देश्य उपलब्ध assets से creditors को अधिकतम संभव recovery दिलाना है, वहीं दूसरी तरफ lenders के लिए यह सवाल अहम है कि किसी बड़े debt exposure में guarantor की वास्तविक financial capacity और assets का आकलन कितनी गहराई से किया जाता है।
निष्कर्ष: NCLT के फैसले के तहत करीब ₹22,006.57 करोड़ के admitted claims के मुकाबले ₹6.5 करोड़ का plan मंजूर हुआ है। यह लगभग 99.97% haircut के बराबर है। हालांकि, यह मामला अभी कानूनी चुनौती से पूरी तरह बाहर नहीं है और आगे appellate proceedings में इसकी तस्वीर बदल भी सकती है।