CBSE की Three-Language Policy
CBSE की Three-Language Policy: क्या है नया नियम और विवाद क्यों?
नई दिल्ली | 21 अगस्त 2026
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की Three-Language Policy को लेकर इन दिनों देशभर में बहस चल रही है। यह नीति National Education Policy (NEP) 2020 के उस प्रावधान से जुड़ी है, जिसमें विद्यार्थियों को तीन भाषाओं का अध्ययन करने की व्यवस्था है और कम-से-कम दो भाषाएं भारत की मूल/भारतीय भाषाएं होनी चाहिए।
क्या है Three-Language Policy?
नई व्यवस्था के तहत विद्यार्थियों को तीन भाषाएं पढ़नी होंगी। इनमें कम-से-कम दो भारतीय भाषाएं (Bhartiya Bhashas) होना आवश्यक है।
तीसरी भाषा भी भारतीय भाषा हो सकती है या निर्धारित नियमों के अनुसार विदेशी भाषा का विकल्प हो सकता है। CBSE की गाइडलाइंस में विदेशी भाषा को तीसरी भाषा के रूप में लेने की व्यवस्था भी बताई गई है।
इस नीति का उद्देश्य विद्यार्थियों में बहुभाषिक क्षमता, भारतीय भाषाओं के प्रति रुचि और व्यापक भाषाई समझ विकसित करना बताया गया है। CBSE ने कहा है कि भाषा सीखना केवल परीक्षा तक सीमित न रहकर meaningful, engaging और enriching होना चाहिए।
किन कक्षाओं पर असर?
CBSE ने Academic Session 2026–27 से Three-Language Policy के implementation को लेकर विशेष guidelines जारी की हैं।
विशेष रूप से Secondary Stage में Class IX और X में तीसरी भाषा यानी R3 की व्यवस्था महत्वपूर्ण है। यह Middle Stage की Classes VI–VIII में भाषा अध्ययन को आगे बढ़ाने के रूप में बताई गई है।
हालांकि CBSE ने transition को लेकर कुछ महत्वपूर्ण छूट भी दी हैं।
मौजूदा Class X विद्यार्थियों को राहत
CBSE ने स्पष्ट किया कि वर्तमान Class X batch पर नई भाषा नीति लागू नहीं होगी।
इसके अलावा वर्तमान Class VII, VIII और IX के विद्यार्थियों के लिए भी transition संबंधी विशेष प्रावधान किए गए हैं। उदाहरण के लिए, जिन विद्यार्थियों ने पहले ही दो विदेशी भाषाएं ली हैं, उन्हें एक अतिरिक्त भारतीय भाषा के साथ अपनी पढ़ाई जारी रखने की अनुमति दी गई है।
विवाद क्यों शुरू हुआ?
नीति की घोषणा के बाद कुछ अभिभावकों और विद्यार्थियों ने इसका विरोध किया।
मुख्य चिंता यह है कि कई स्कूलों में तीसरी भाषा पढ़ाने के लिए पर्याप्त शिक्षक, किताबें और अन्य अध्ययन सामग्री उपलब्ध नहीं हैं।
याचिकाकर्ताओं की ओर से सुप्रीम कोर्ट में यह भी दलील दी गई कि नई व्यवस्था लागू करने से पहले पर्याप्त infrastructure और teachers की व्यवस्था नहीं की गई।
सुप्रीम कोर्ट में मामला क्यों पहुंचा?
Three-Language Policy को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई शुरू की है।
20 अगस्त 2026 की सुनवाई में कोर्ट ने नीति के कुछ पहलुओं पर गंभीर सवाल उठाए। खास तौर पर कोर्ट ने पूछा कि क्या English को “non-indigenous” language मानना उचित है, जबकि अंग्रेजी का भारत के न्यायालयों, प्रशासन और शिक्षा व्यवस्था में लंबे समय से व्यापक इस्तेमाल होता रहा है।
कोर्ट ने संकेत दिया कि इस classification की संवैधानिकता की जांच की आवश्यकता हो सकती है।
English को लेकर बड़ा सवाल
यह विवाद का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।
नीति में कम-से-कम दो भाषाओं को भारतीय भाषाएं रखने की बात है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर कोई विद्यार्थी English को अपनी प्रमुख भाषा के रूप में पढ़ता है तो उसके लिए तीसरी भाषा की व्यवस्था कैसे होगी?
सुप्रीम कोर्ट ने इसी संदर्भ में सवाल उठाया कि क्या आज के भारतीय सामाजिक और संवैधानिक संदर्भ में English को पूरी तरह “विदेशी” या “non-indigenous” मानना उचित है।
सरकार और CBSE का पक्ष
केंद्र सरकार, CBSE और NCERT ने नीति का बचाव किया है।
उनका तर्क है कि Three-Language Formula का उद्देश्य विद्यार्थियों पर अनावश्यक बोझ डालना नहीं, बल्कि multilingualism और national integration को बढ़ावा देना है।
सरकार के अनुसार भारतीय भाषाओं का ज्ञान विद्यार्थियों को भारत की विविध भाषाई और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने में मदद करेगा।
क्या छात्र को हिंदी ही पढ़नी होगी?
नहीं।
Three-Language Policy का अर्थ यह नहीं है कि देश के हर CBSE विद्यार्थी के लिए हिंदी अनिवार्य कर दी गई है।
नीति का मूल जोर तीन भाषाओं के अध्ययन और उनमें से कम-से-कम दो के भारतीय भाषाएं होने पर है। भारतीय भाषाओं में विद्यार्थी के क्षेत्र और उपलब्ध विकल्पों के अनुसार अलग-अलग भाषाएं हो सकती हैं।
इसलिए दक्षिण भारत, पूर्वोत्तर या अन्य राज्यों के विद्यार्थियों के लिए स्थानीय/क्षेत्रीय भारतीय भाषाओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
विदेशी भाषा का क्या होगा?
विदेशी भाषा पूरी तरह समाप्त नहीं की गई है।
CBSE की 2026 guidelines के अनुसार विदेशी भाषा को तीसरी भाषा के रूप में लेने की अनुमति कुछ परिस्थितियों में है, लेकिन विद्यार्थी को पहले दो भारतीय भाषाओं का अध्ययन करना होगा। विदेशी भाषा को अतिरिक्त चौथी भाषा के रूप में लेने का विकल्प भी बताया गया है।
विद्यार्थियों और अभिभावकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बातें
1. तीन भाषाओं का अध्ययन Three-Language Formula का मुख्य हिस्सा है।
2. कम-से-कम दो भाषाएं भारतीय भाषाएं होनी चाहिए।
3. नई व्यवस्था Academic Session 2026–27 से लागू करने के लिए guidelines जारी की गई हैं।
4. मौजूदा Class X batch को नई policy से बाहर रखा गया है।
5. पहले से Class VII–IX में पढ़ रहे विद्यार्थियों के लिए transition provisions बनाए गए हैं।
6. पर्याप्त teachers और learning material को लेकर सवाल उठे हैं।
7. नीति को चुनौती देने वाली याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं।
CBSE की Three-Language Policy का उद्देश्य भारत में multilingual education और भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देना है। लेकिन इसके implementation को लेकर कई व्यावहारिक और संवैधानिक सवाल सामने आए हैं।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हर स्कूल के पास तीन भाषाएं प्रभावी रूप से पढ़ाने के लिए पर्याप्त शिक्षक और resources मौजूद हैं?
दूसरा महत्वपूर्ण सवाल English की स्थिति को लेकर है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने भी सवाल उठाया है।
इसलिए फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि नीति पूरी तरह अंतिम रूप में तय हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट की आगे की सुनवाई और CBSE/सरकार के जवाब इस नीति के अंतिम स्वरूप को प्रभावित कर सकते हैं।
सार:
Three-Language Policy = 3 भाषाएं + कम-से-कम 2 भारतीय भाषाएं + multilingual education, लेकिन 2026 में इसके implementation, English की स्थिति और स्कूलों की तैयारी को लेकर सुप्रीम कोर्ट में महत्वपूर्ण कानूनी बहस चल रही है।