UP Gangsters Act पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट की UP Gangsters Act पर बड़ी टिप्पणी: ‘Stillborn’ कानून क्यों कहा?
नई दिल्ली | 21 अगस्त 2026
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के Gangsters and Anti-Social Activities (Prevention) Act, 1986 को लेकर शुक्रवार को महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। दो-जजों की पीठ—जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन—ने कहा कि इस कानून में एक महत्वपूर्ण कानूनी कमी है: यह “गैंग” और “गैंगस्टर” की परिभाषा तो देता है, लेकिन स्वयं कोई अलग और स्वतंत्र आपराधिक अपराध (distinct criminal offence) नहीं बनाता।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने कानून को “stillborn” यानी ऐसा कानून बताया जो अपराध को स्वतंत्र रूप से स्थापित ही नहीं करता।
कोर्ट के अनुसार, Act में जिन गतिविधियों का उल्लेख किया गया है—जैसे kidnapping, drug trafficking या human trafficking—वे पहले से ही IPC अथवा अन्य आपराधिक कानूनों के तहत अपराध हैं।
लेकिन Gangsters Act किसी व्यक्ति को केवल “gangster” की स्थिति में रखकर उसके लिए एक अलग अपराध निर्मित नहीं करता।
कोर्ट ने इसी आधार पर कहा कि किसी व्यक्ति को “gangster” कह देना अपने आप में ऐसा अपराध नहीं बन सकता जिसके लिए इस Act के तहत सजा दी जाए।
मामला किससे जुड़ा था?
यह मामला दो वकीलों—Shiv Pratap Singh और Himanshu Srivastava—के खिलाफ Gangsters Act के तहत शुरू हुई कार्यवाही से जुड़ा था।
शिव प्रताप सिंह के खिलाफ मामला Fatehgarh Bar Association, Farrukhabad के चुनाव विवाद से संबंधित था। उन्हें बाद में कथित गैंग का सदस्य बताया गया और उनके खिलाफ Gangsters Act के तहत FIR दर्ज की गई।
दूसरे मामले में हिमांशु श्रीवास्तव और उनके परिवार के सदस्यों के खिलाफ कार्यवाही की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने इन मामलों में Gangsters Act के तहत चल रही कार्यवाही को quash कर दिया।
‘Gangster’ घोषित करना पर्याप्त नहीं
फैसले का एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत यह है कि किसी व्यक्ति को किसी अपराध का दोषी ठहराने के लिए कानून में स्पष्ट अपराध और उसकी सजा का प्रावधान होना चाहिए।
भारतीय संविधान के Article 20(1) से जुड़े सिद्धांत के अनुसार, किसी व्यक्ति को ऐसे कृत्य के लिए दंडित नहीं किया जा सकता जिसे कानून ने अपराध के रूप में स्थापित ही नहीं किया है।
इसी सिद्धांत के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि Act स्वयं कोई स्वतंत्र अपराध नहीं बनाता, तो केवल “gangster” की पहचान के आधार पर उसके तहत सजा नहीं दी जा सकती।
Gang Chart पर भी सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी चिंता जताई कि Gangsters Act की प्रक्रिया में Gang Chart महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
कोर्ट के अनुसार, केवल Gang Chart में किसी व्यक्ति का नाम शामिल होने के आधार पर हिरासत और आगे की आपराधिक कार्यवाही की स्थिति पैदा हो सकती है।
अदालत ने इस व्यवस्था को गंभीरता से देखा, क्योंकि यदि मूल Act स्वयं कोई अलग अपराध नहीं बनाता, तो केवल किसी व्यक्ति को “gangster” घोषित करके उसके खिलाफ अतिरिक्त दंडात्मक कार्रवाई करना कानूनी रूप से समस्याग्रस्त हो सकता है।
क्या सुप्रीम कोर्ट ने पूरा Gangsters Act असंवैधानिक घोषित कर दिया?
नहीं। यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला पूरे कानून की संवैधानिक वैधता पर अंतिम फैसला देते हुए नहीं सुनाया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने कानून की constitutional validity के व्यापक प्रश्न पर निर्णय नहीं दिया है। उसका निष्कर्ष मुख्यतः इस बात पर आधारित था कि Act में स्वतंत्र criminal offence का निर्माण नहीं हुआ है।
इसलिए यह कहना कि “सुप्रीम कोर्ट ने UP Gangsters Act को पूरी तरह असंवैधानिक घोषित कर दिया” सही नहीं होगा।
सटीक बात यह है कि कोर्ट ने Act की मौजूदा संरचना में अपराध और सजा के बीच आवश्यक वैधानिक आधार की कमी को देखते हुए संबंधित कार्यवाहियों को रद्द किया।
कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि जिस कानून का उद्देश्य हिंसा और अपराध को रोकना है, वही कानून यदि बिना स्पष्ट अपराध स्थापित किए नागरिकों के खिलाफ इस्तेमाल हो, तो वह अनजाने में निर्दोष नागरिकों को नुकसान पहुंचा सकता है।
कोर्ट ने George Orwell के संदर्भ का इस्तेमाल करते हुए कानून के संभावित दुरुपयोग पर गंभीर चिंता व्यक्त की।
इसका असर क्या हो सकता है?
इस फैसले के बाद UP Gangsters Act के तहत चल रहे या भविष्य में शुरू होने वाले मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न उठेगा:
क्या केवल किसी व्यक्ति को “gangster” की श्रेणी में रखकर उसे Gangsters Act के तहत दंडित किया जा सकता है, जबकि Act स्वयं कोई अलग अपराध परिभाषित नहीं करता?
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से ऐसे मामलों में बचाव पक्ष को महत्वपूर्ण कानूनी आधार मिल सकता है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति के खिलाफ मूल अपराधों—जैसे हत्या, अपहरण, नशीले पदार्थों की तस्करी या अन्य अपराध—की कार्रवाई स्वतः समाप्त हो जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अन्य penal laws के तहत लगाए गए आरोप अपनी कानूनी प्रक्रिया के अनुसार आगे बढ़ सकते हैं।
एक और महत्वपूर्ण हालिया फैसला: Gangsters Act केस से दूसरे मुकदमे नहीं रुकेंगे
इससे कुछ दिन पहले, 17 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने Section 12 को लेकर भी महत्वपूर्ण फैसला दिया था।
कोर्ट ने कहा कि Gangsters Act का मुकदमा लंबित होने का मतलब यह नहीं है कि आरोपी के खिलाफ चल रहा कोई दूसरा criminal trial अपने आप रोक दिया जाए।
Section 12 का उद्देश्य केवल तब Gangsters Act के trial को प्राथमिकता देना है जब दूसरे मुकदमे की तारीख से वास्तविक clash हो। यह provision दूसरे मुकदमों को अनिश्चितकाल के लिए freeze करने का अधिकार नहीं देता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि Article 21 के तहत speedy trial का अधिकार केवल आरोपी का नहीं, बल्कि पीड़ित का भी महत्वपूर्ण अधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों से UP Gangsters Act की कार्यप्रणाली पर महत्वपूर्ण कानूनी सीमाएं स्पष्ट हुई हैं।
मुख्य बातें:
- Gangsters Act में “gang” और “gangster” की परिभाषा है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के अनुसार Act स्वयं कोई अलग criminal offence नहीं बनाता।
- केवल “gangster” का दर्जा किसी व्यक्ति को दंडित करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता।
- संबंधित दो मामलों में Gangsters Act की कार्यवाही quash कर दी गई।
- कोर्ट ने पूरे Act को असंवैधानिक घोषित नहीं किया है।
- मूल अपराधों के तहत चलने वाली अलग criminal proceedings स्वतः समाप्त नहीं होतीं।
- Gangsters Act का मुकदमा लंबित होने से दूसरे criminal trials अपने आप अनिश्चितकाल के लिए नहीं रुकेंगे।
- Speedy trial का अधिकार आरोपी के साथ-साथ पीड़ित का भी अधिकार है।
इस फैसले का सबसे बड़ा संदेश यही है कि किसी व्यक्ति को “gangster” की श्रेणी में रखना और उसे उस आधार पर दंडित करना—इन दोनों के बीच कानून में स्पष्ट और वैध अपराध का होना जरूरी है।